
बात कुछ यूँ शुरू हुई ।
मै ऑफिस से वापस घर लौट रहा था। रस्ते में तकरीबन पूरा द्वारका पड़ता है। द्वारका में सुन्स्सन इलाका है जहाँ पर सिर्क एक सड़क है और चारो तरफ कम से कम एक किलोमीटर तक खली मैदान । शाम का समय था और सूरज अपने शबाब पर था। मैंने अपनी कार रोकी और सूरज को निहारता हे चला गया। और बस उस निहारने में ये ब्लॉग सोचा।
हमारे लिए सूरज क्या है ? एक सूरज, सिर्फ एक सूरज ने "दिन और रात" की परिभाषा दे दी। वर्ना दिन और रात तो कुछ भी नहीं , वोही धरती है, वोही आसमान है , वोही समय है , वोही मौसम है, और वोही हम।
अगर देखा जाये तो सूरज एक तारा है, " जो मर रहा है "। वो बस दिन रात ( वैसे दिन रात सूरज के लिए नहीं हो सकते) जल रहा है। है क्या एक आग का गोला ही तो है । हम धरती वालो के लिए थोड़ी सी भी ज्यादा आग विनाश का सूचक होती है। हमारे लिए बारूद , बोम्ब , तो बस यमदूत का रूप होते हैं । जंगल की आग से पता नहीं कितना नुक्सान होता है । ऐसे हे सूरज भी तो एक आग का गोला है , और वो भी धरती से बड़ा।
पर हम कहते हैं , की कल सुबह काम करेंगे नहा धो कर, पूजा सुबह करेंगे, पढाई सुबह करेंगे, हर अछा काम सुबह करेंगे। पता नहीं सुबह ऐसा क्या हो जाता है । वो पता नहीं कितने समय से जल रहा है । हमे दिखना बंद हो गया तो हमने उसे रात मन लिया। वो वापस दिख गया तो शुभ मन लिया। शायद अपने आप को ही खुश कर लेते हैं।
दूसरी बात वो जल रहा है, पर क्यूँ? हमे रौशनी देने के लिए नहीं। रौशनी विस्फोटक चीज़ नहीं देती। रौशनी के लिए शांत मोमबती होती है , विनाशकारी आग नहीं। वो हमे अपनी मर्ज़ी से रौशनी नहीं दे रहा , वो मर रहा है। वो आग सूरज को रोज़ मारती है। हर रोज सूरज मौत के करीब आता है।
पर उस मरते हुए को हम भगवान् मानते हैं । रोज़ उसे जल समर्पित करते हैं । उसे पूजते हैं। हम सुरज को नमस्कार करते है , उसे जो एक जल्ती हुइ आग है। है ना कितनी अजीब बात। कितना महत्तव रखता है सूरज हमारी जिन्दगी मे। सूरज की किरनो को हम शुभ मानते है. कफी बारिश के बाद सुबह बोल्ते है , कितनी खिलि खिलि और प्यारी धूप निकली है। एक जल्ते हुए आग के गोले की रोशनी को हम प्यारी और खिलि खिलि बोलते है.
अन्त मे तो यही कहून्गा कि या तो सूरज भगवान है जो खुद जलकर हमे रोशनी देते है , या हमने एक मरते हुए को भगवान मन लिया है।